नई दिल्ली : एल्गार परिषद मामले में आरोपी सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ से सुरेंद्र गाडलिंग के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने जमानत याचिका पर सुनवाई की अपील की। उन्होंने कहा कि मेरे मुवक्किल 6.5 साल से जेल में है। सर्वोच्च न्यायालय में जमानत याचिका पर सुनवाई 11 बार स्थगित की जा चुकी है।”
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हम इसे सूचीबद्ध करेंगे। इससे पहले 27 मार्च को न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की पीठ ने मामले में गिरफ्तार गडलिंग और कार्यकर्ता ज्योति जगताप की जमानत पर सुनवाई स्थगित कर दी थी। न्यायालय ने कार्यकर्ता महेश राउत को दी गई जमानत को चुनौती देने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की याचिका को भी स्थगित कर दिया था। यह मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एल्गर परिषद सम्मेलन में कथित तौर पर दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है, जिसके कारण अगले दिन पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा में हिंसा भड़क गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ऑटिज्म की स्थितियों वाले व्यक्तियों की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें ऑटिज्म जैसी स्थितियों वाले व्यक्तियों के कल्याण को बनाए रखने में संस्थागत उदासीनता का आरोप लगाया गया है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति केवी. विश्वनाथन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की। याचिका में राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 सहित विभिन्न कानूनों के कार्यान्वयन में विफलता का दावा किया गया था। कानून का उद्देश्य ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी आदि और बहु विकलांगताओं से ग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण से संबंधित है। याचिकाकर्ता संस्था एक्शन फॉर ऑटिज्म के वकील ने कहा कि हम आपका ध्यान ऑटिज्म, डिस्लेक्सिया जैसी न्यूरोडायवर्जेंट स्थितियों वाले व्यक्तियों के प्रति सांविधानिक, वैधानिक और अंतरराष्ट्रीय दायित्व को बनाए रखने में प्रतिवादियों की निरंतर उपेक्षा, संस्थागत उदासीनता और विफलता की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। इस पर पीठ ने कहा कि हम पहले पांच प्रतिवादियों (केंद्र और अन्य) को नोटिस जारी करेंगे। हम फिलहाल राज्यों को अलग रखेंगे। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 29 अगस्त के लिए स्थगित कर दी।
धर्मस्थल मामले में मीडिया कवरेज रोकने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कर्नाटक के धर्मस्थल सामूहिक कब्र मामले पर मीडिया की रिपोर्टिंग पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कर्नाटक की एक निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह धर्मस्थल मंदिर के सचिव द्वारा दायर याचिका पर नए सिरे से निर्णय ले। सचिव ने याचिका में मंदिर का प्रबंधन करने वाले परिवार को निशाना बनाने वाली कथित अपमानजनक सामग्री को हटाने की मांग की थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि गैग आदेश केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही पारित किए जाते हैं और याचिकाकर्ता से कहा कि वह सभी सामग्री ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश करें। पीठ ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
उच्च न्यायालय ने एक अगस्त को बंगलूरू सिविल कोर्ट द्वारा जारी उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें दफनाने के मामले पर रिपोर्टिंग पर रोक लगाई गई थी। याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि लगभग 8,000 यूट्यूब चैनल मंदिर के खिलाफ अपमानजनक सामग्री चला रहे हैं। धर्मस्थल मंदिर निकाय के सचिव हर्षेन्द्र कुमार डी ने कथित अपमानजनक सामग्री को हटाने की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।