बागपत:  पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के निधन की खबर जैसे ही उनके पैतृक गांव हिसावदा पहुंची, पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। गांव के बुजुर्गों की आंखें नम हैं और युवाओं के चेहरे पर अपने बीच के एक सादगीपूर्ण, बेबाक और जमीन से जुड़े नेता को खो देने का गम साफ झलक रहा है।

हिसावदा गांव में सत्यपाल मलिक की 300 साल पुरानी हवेली आज भी मौजूद है। जहां कभी वे अपने बचपन और किशोरावस्था के दिनों में सीढ़ियों पर बैठकर घंटों गपशप किया करते थे। हालांकि अब उनका परिवार गांव में नहीं रहता, लेकिन उनके कुटुंब के कई सदस्य अभी भी यहीं बसे हुए हैं।

परिवारजनों ने बताया कि राज्यपाल पद से सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2023 में वे गांव आए थे। उन्होंने अपने बचपन के दोस्तों, परिचितों और ग्रामीणों से मुलाकात की थी। उस दिन उन्होंने गांव की गलियों में घूमकर पुरानी यादें ताजा की थीं, और कहा था-ये मिट्टी मेरी ताकत है।

आज वही गलियां खामोश हैं, हवेली के आंगन में दुख का सन्नाटा पसरा है और गांव वाले एक-दूसरे से बस यही कह रहे हैं- हमारे बीच से एक अच्छा नेता चला गया… जिसकी भरपाई अब नहीं हो सकेगी।

बुजुर्ग वीरेंदर सिंह मलिक ने बताया कि हमसे उम्र में करीब छह वर्ष छोटे थे लेकिन सम्मान बहुत करते थे। जब भी गांव में कार्यक्रम हुआ मुझे अवश्य बुलाते और सम्मान करते थे। वह बताते हैं कि सत्यपाल मलिक बचपन मे बड़े शर्मिंले थे, कोई कुछ कहता तो हमसे शिकायत करते थे। वालीवाल खेलने के शौकीन रहे।